आज भी परंपरा में जीवित है जनी शिकार

 

रांची।  रांची के आसपास के इलाकों में पारंपरिक रूप से मनाई जानेवाली जनी शिकार आदिवासियों में काफी लोकप्रिय है। हर 12 साल में मनाई जाने वाली जनी शिकार का आयोजन इस बार रविवार को किया गया। इसमें लगभग पांच हज़ार महिलाओं ने हिस्सा लिया।

खास कर उरांव आदिवासी समुदाय की महिलाएं पुरुषों का पहनावा पहन कर जंगलों शिकार करने निकलती हैं। इस जनी शिकार का आयोजन सामूहिक रूप से होता है।

लेकिन अब टोला-मोहल्लों में पारंपरिक हथियारों के साथ महिलाएं घूमती हैं और सामूहिक रूप से जनी शिकार करती हैं।

महिलाओं ने टोला-मोहल्लों में जाकर जो भी मिला, जैसे, मुर्गी, बकरी सहित अन्य जानवरों को पकड़ा और अपनी लकड़ी में टांग कर लेकर चली गईं।

रांची शहर के कई इलाकों में जनी शिकार का माहौल बना रहा। जैसे ही लोगों को महिलाओं के समूह के हथियारों के साथ पुरुष वेशभूषा में पहुंचने की जानकारी मिली, वैसे ही अपने पालतू जानवरों को छिपाना शुरू कर दिया। महिलाओं ने कड़ी धूप में जोश से जनी शिकार किया।

अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के महासचिव सत्यनारायण लकड़ा ने बताया कि जिस समय पठान लोग अपना साम्राज्य फैला रहे थे, तो उनकी नजर उरांव जनजाति समुदाय के गढ़ रोहतासगढ़ पर पड़ी। वे वहां अपना अधिकार जमाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने गढ़ का भेद जानने के लिए गुप्तचर बहाल किए। इसके लिए उन्होंने ग्वालिनों को अपना हथियार बनाया और वे गढ़ में दूध देने का काम करती थी।

उन्होंने बताया कि गढ़ के उरांव इतने साहसी और वीर हैं कि उनसे लोहा लेना आसान नहीं है। इसलिए उन्होंने सरहुल के दिन जब सभी पूजा व त्योहार में लीन रहते हैं, उस समय आक्रमण करने की सलाह दी। इसके बाद सरहुल के दिन पठानों की विशाल सेना ने रोहतास गढ़ में आक्रमण किया।

यह देख उरांव महिलाएं पुरुषों की वेशभूषा व तीर, धनुष, भाला-कुल्हाड़ी लिए शत्रु सेना पर टूट पड़ीं और उन्हें भगाया। परंतु, पठानों को पता नहीं चला कि उनकी सेना को महिलाओं ने हरा दिया। इस तरह 12 वर्षो तक रमणियों ने रोहतास गढ़ को बचाने के लिए युद्ध लड़ा। हर बार पठानों को हराया।

बाद में पठानों को पता चला कि सरहुल के दिन जो लगातार युद्ध लड़े रहे हैं, वे असल में उरांव समुदाय की महिलाएं हैं। अगली बार पठानों ने पूरी तैयारी व कूटनीति के साथ आक्रमण किया। साथ में तोप का भी उपयोग किया। महिलाएं वीरता के साथ लड़ीं और वीरगति को प्राप्त किया। इसी की याद में 12 वर्ष के बाद अनूठी परंपरा को निभाते हुए जनी शिकार मनाया जाता है।

%d bloggers like this: