संताली लोक साहित्यकार बाबुलाल मुर्मू पर हुई परिचर्चा

 

 

दुमका। सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय में मंगलवार को लोक साहित्यकार बाबुलाल मुर्मू आदिवासी जी पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। यह परिचर्चा साहित्य में स्वर्गीय बाबुलाल मुर्मू के योगदान पर केंद्रित थी। विश्वभारती शांतिनिकेतन की प्रोफेसर मंजूरानी सिंह ने कहा कि बाबुलाल मुर्मू आदिवासी भारत के महान लोक साहित्यकार थे।

प्रो. मंजूरानी सिंह ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुई कहा कि संताली साहित्य किसी भी लिपि में व्यक्त हो उसे सर्जनात्मकता के आधार पर सम्मानित किया जाना चाहिए। संताल परगना में देवनागरी लिपि में संताली साहित्य के सृजन को बढ़ावा मिलना चाहिए। साथ ही साथ साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ से उसे साहित्य की कसौटी के आधार पर उसका मुल्यांकन करे न कि लिपि के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव किया जाए। झारखंड सरकार और सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय को भी इस दिशा में प्रयास करना चाहिए।

परिचर्चा में विजय टुडू ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आदिवासी साहित्य का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया जाना चाहिए। डॉ धुनी सोरेन ने कहा कि बाबुलाल मुर्मू संताल संस्कृति की अस्मिता के साहित्यकार थे।

सिदो कान्हु विश्वविद्यालय की डॉ प्रमोदनी हांसदा ने कहा कि संताली साहित्य में भाव और संवेदना अत्यंत उत्कृष्ट कोटि की है। यह भाषा और साहित्य की दृष्टि से समृद्ध साहित्यों से किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं है।

परिचर्चा में अपनी बात रखते हुए सूचना एंव जनसम्पर्क विभाग संताल परगना प्रमंडल के उप निदेशक अजयनाथ झा ने कहा कि लोक साहित्य में आदिवासी जी के योगदान को देखते हुए प्रत्येक वर्ष विभाग द्वारा एक साहित्यकार को आदिवासी सम्मान से सम्मानित किया जाएगा।

इस अवसर पर सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में बाबुलाल मुर्मू आदिवासी जी के साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन पर शोध कर रही छात्रा कंचन रानी को डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी के लिए उत्तीर्ण घोषित किया गया।

इस अवसर पर वक्ताओं को सुनने के लिए विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं एंव प्रध्यापक उपस्थित थे।

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