विचारः नाचता आदिवासी

 

असिस्टेंट प्रोफेसर रोशन प्रवीण खलखो, दिल्ली विश्वविद्यालय

वर्ष 2015 का ‘साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार’ से सम्मानित डॉ सौवेंद्र शेखर हाँसदा पर आज मौसम रूठ गया है. लेकिन मौसम साल भर एक जैसा नहीं रहता. डॉ हाँसदा अपने कहानियों और उपन्यास में आदिवासी समाज का मार्मिक चित्रण करते हैं. यह चित्रण इतना दर्दनाक है कि मन विचलित और भावुक हो उठता है. मन में सवाल पैदा होता है कि क्या आदिवासी समाज के साथ ऐसा ही होता है? क्या हमारी बहनें महज दो ब्रेड पकौड़ों के लिए अपनी आत्मा से सौदा कर लेती हैं?

यह कतई सच नहीं कि आदिवासी समाज के हरेक महिला को इस दौर से गुजरना पड़ता है. लेकिन अगर एक भी औरत इस भयावह राहों से होकर गुजरती है तो समाज को संवेदनशील और व्यथित होना ही चाहिए. इसी दर्दभरी व्यथा को अपनी लेखनी में हू-ब-हू चित्रित करना, डॉ हाँसदा का एक अत्यंत साहसिक योगदान है. प्रदेश के संथाली समुदाय की महिला और पुरुषों का दर्द वही देख सकता है, समझ सकता है जो अत्यंत संवेदनशील निगाहें रखता है. आजादी के इतने वर्षों के बाद भी इस बात में कोई शक नहीं की आदिवासी समाज एक शोषित समाज है. यह ऐसा समुदाय है जिसका आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक और सामाजिक शोषण, तमाम तरह के सनातनी और मौसमी शोषकों के लिए आज भी बहुत ही सहज और आसान बना हुआ है. ये  आदिवासियों को बहला-फुसलाकर, उनसे दो मीठी बातें बोल कर उनका शोषण करते रहे हैं. ऐसी परिस्थिति में शारीरिक या यौन शोषण में प्यार की उम्मीद रखना हमारी नादानी और बेवकूफी ही प्रतीत होती है.

डॉ हाँसदा के लेखन को या फिर उनके लेखन में चित्रित समाज को दो तरीकों से समझा जा सकता है. पहले तरीके के बदौलत, हम आदिवासी समाज में हो रहे शोषण को समाज के सामने सोच समझ कर, कुछ तथ्यों को छुपाकर उजागर करते हैं, ताकि समाज के ‘संस्कार’ को आघात न पहुंचे, शालीन होना कतई बुरी बात नहीं है. दूसरे तरीके में हम शोषण के हरेक पहलू को हू–ब-हू समाज के सामने पेश कर देते हैं, ताकि समाज की अनदेखी-अनकही कमियां नजर आने लगे. समाज की सोई हुई मानसिकता को गहरी नींद से उठाना ही इसका मकसद होता है. आखिर साहित्य ही तो समाज का दर्पण होता है या होना चाहिए.

साहित्य यौन शोषण का विषद और सटीक विवरण करता है उसे पोर्न से परिभाषित करना अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. ‘पोर्न’ शब्द के सिर्फ शब्दार्थ में सिमट कर पोर्न को परिभाषित करना सही नहीं है. शब्दार्थ के साथ उसका भावानुवाद और कार्यानुवाद का भी ख्याल रखना चाहिए. पोर्न के अंतर्गत आने वाले ‘साहित्य’ या ‘चित्रण’ में लेखक, पाठक और ‘दर्शक’ सभी को एक सस्ते आनंद की अनुभूति होती है. उन सभी चीजों का उद्देश्य सिर्फ आनंद देना होता है. ऐसे में डॉ हाँसदा की कहानियों को पोर्न की संज्ञा देना, न केवल गलत है बल्कि डॉ हाँसदा के हासिये के प्रति संवेदनशीलता पर कुठाराघात है. डॉ हाँसदा जब आदिवासी महिलाओं के शोषण का जिक्र करते हैं उन्हें कोई आनंद नहीं बल्कि शोषण की पीड़ा का एहसास होता है.

द हिन्दू, एक प्रमुख न्यूजपेपर से बातचीत के दौरान डॉ हाँसदा कहते हैं, “ The sex in the book is without romance.. It’s not enjoyable, it’s disturbing. So I told it as it is.”

जब अपने समाज के प्रति संवेदनशील व्यक्ति इन कहानियों को पढ़ता है तो उसे किसी आनन्द की प्राप्ति नहीं होती बल्कि वह विचलित हो उठता है. रीडर की चेतना में इस दर्द के साथ अपने समाज की भलाई के लिए कुछ करने की इच्छा जागृत होती है. अगर किसी व्यक्ति को सचमुच डॉ हाँसदा के कहानियों को पढ़ कर यौन की अनुभूति होती है या आनंद मिलता है तो वह आदिवासी शोषित वर्ग का हितैषी कभी नहीं हो सकता.

‘जोहार खबर डॉटकॉम’ से एक साक्षात्कार में डॉ हाँसदा कहते हैं, “अगर लोग सशक्तिकरण खोजेंगे तो उन्हें मेरी कहानियों में सशक्तिकरण मिलेगा. लोग अगर दर्शन खोजेंगे तो मेरी कहानियों में दर्शन मिलेगा. लेकिन अगर लोगों के मन में ही मैल भरा है, लोग सेक्स को बुरा मानते हैं, जो हरेक चीज़ में, धुल-कण में सेक्स खोज रहे हैं तो उन्हें सेक्स ही दिखेगा.”

जिस समाज में तलामोय जैसी एक लड़की को दो ब्रेड पकौड़े और पचास रूपये की खातिर अपने बदन को एक ‘दिकू’ के हाथों मसले जाने के लिए राजी होना पड़ता है, तो उस समाज को महिला ‘अस्मिता’ से ज्यादा महिला सशक्तिकरण पर जोर देना चाहिए. डॉ हाँसदा के साहित्य को एक साफ़ (न की धुंधला) दर्पण समझ कर हमें अपनी अंतरात्मा में झांकना चाहिए और वो भी जितनी जल्दी हो सके.

‘आदिवासी विल नॉट डांस’ का प्रतिबंधित होना हमारे आदिवासी समाज के लिए अत्यंत दुखद और चिंता का विषय है. यह हमारे आवाज को दबाने की कोशिश है. इस कहानी-संग्रह की सिर्फ एक कहानी अपनी विशेष तरीके के भाषा-प्रयोग की वजह से ‘विवादस्पद’ कही जा सकती है लेकिन बाकी नौ कहानियां हमारे आदिवासी अस्मिता, अधिकार और अस्तित्व की लड़ाई में मजबूती से हमारे साथ खड़ी दिखाई देती हैं. यह सोचकर मन विचलित हो उठता है कि हम शुद्धता का चादर ओढ़ कर, टब के पानी के साथ बच्चे भी फेक आते हैं. झारखण्ड सरकार की डोमिसाइल नीति के खिलाफ आवाज उठाकर डॉ हाँसदा पहले से ही सरकार की आँखों में चढ़ चुके थे. हमने अपनी गुटबाजी और केकड़ा सोच के कारण सरकार को एक मनचाहा मौका मुहैया करवा दिया. डॉ हाँसदा अपनी कहानियों में संभ्रात परिवार या वर्ग के लोगों को केन्द्रीय विषय नहीं बनाते बल्कि उनकी कलम शोषित समाज की महिला और पुरुषों के इर्द गिर्द ही घूमती है. आज उनके द्वारा अपने ही आदिवासी समाज के हासिये के लोगों के लिए आवाज उठाने को अपराध बताया जा रहा है. झारखण्ड में किसी भी पार्टी की सरकार हो, उनके लिए तो डॉ हाँसदा आज मंगल मुर्मू बन चुके हैं. श्लीलता और अश्लीलता की हमारी लड़ाई में सरकार को आदिवासी ‘अस्मिता’ के प्रति सहानुभूति दिखाने की वजह मिल गयी है. और यही वजह रही की ‘आदिवासी विल नॉट डांस’ झारखण्ड में बैन हो गयी है. सबसे ज्यादा हास्यास्पद और चिंताजनक यह है कि जो यह भी नहीं जानते की मंगल मुर्मू कौन है वो आज बढ़-चढ़ कर अपने आपको आदिवासियों का हितैषी बता रहे हैं.

बैन तो कोयला रोड को होना चाहिए था (हालाँकि वो मालिकों की अपनी लड़ाई से फ़िलहाल बंद पड़ा है, पर किसी न किसी दिन चालू हो ही जायेगा), लखिपुर के 8×8 फीट की झोपड़ियाँ को बैन करना चाहिए था. संथाल परगना से संथालों का पलायन बैन होना चाहिए था. मथाभंगी का मालिक और मोहिनी को बैन होना था. और बैन होना ही था तो आदिवासियों के उन नाचों को जो उन्हें आज भी भूखे पेट सड़कों पर मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर करना पड़ता है.

“हम आदिवासी अब और नहीं नाचेंगे- क्या गलत है इसमें? हम खिलौनों की तरह ही तो हैं- कोई ऑन बटन दबाता है या फिर हमारे पिछवाड़े कोई चाभी लगा देता है और हम संथाल अपने ‘टमाक्’ और ‘टुमड़क्’ पर ताल देना शुरू कर देते हैं या अपने ‘तिरियो’ पर सुर लगाना शुरू कर देते हैं और इसी बीच कोई हमारे नाचने का मैदान छीन कर ले जाता है.”- मंगल मुर्मू (‘Adivasi will not Dance’  का एक अंश, अनुवाद  खुद)

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

 

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